Saturday, January 10, 2026
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विकसित Bharat शिक्षा अधिष्ठान विधेयक: उच्च शिक्षा के लिए एकल शक्तिशाली नियामक, UGC–AICTE–NCTE होंगे समाप्त

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने लोकसभा में विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 पेश कर उच्च शिक्षा नियमन ढाँचे में व्यापक बदलाव की शुरुआत कर दी है, जिसका लक्ष्य देश भर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को बहु‑विषयी, शोध‑प्रधान और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी संस्थानों में बदलना है। प्रस्तावित कानून UGC, AICTE और NCTE जैसे प्रमुख नियामकों की जगह एक नए केंद्रीय आयोग और तीन विशिष्ट परिषदों की त्रिस्तरीय संरचना खड़ी करता है, जो गुणवत्ता, पारदर्शिता और परिणाम‑आधारित मानकों पर केंद्रित होगी।​

विधेयक के तहत विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) नाम का नया शीर्ष आयोग गठित किया जाएगा, जिसके अंतर्गत विकसित भारत शिक्षा विनियमन परिषद, विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद और विकसित भारत शिक्षा मानक परिषद नामक तीन स्वतंत्र निकाय काम करेंगे। ये परिषदें क्रमशः नियमन, मान्यता और मानकों के क्षेत्र में काम करेंगी और चरणबद्ध रूप से UGC, AICTE और NCTE के वैधानिक अधिनियमों को निरस्त कर उनकी भूमिकाएँ अपने हाथ में लेंगी।​

विधेयक के उद्देश्यों के अनुसार, यह कानून “न्यूनतम लेकिन प्रभावी” नियमन के माध्यम से ईमानदारी, सार्वजनिक भावना, सुशासन, वित्तीय स्थिरता और अधिकतम पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। इसके दायरे में राष्ट्रीय महत्व के संस्थान, केंद्रीय व राज्य विश्वविद्यालय, पूर्व‑घोषित डीम्ड विश्वविद्यालय, संबद्ध कॉलेज, ओपन व डिस्टेंस/ऑनलाइन शिक्षा संस्थान, ‘इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस’ और कुछ पेशेवर संस्थान शामिल होंगे, जबकि कुछ विशिष्ट पेशेवर कार्यक्रम अपने स्वायत्त वैधानिक निकायों के अधीन रहेंगे।​

नई संरचना में VBSA आयोग उच्च‑स्तरीय नीति‑निर्माण और रणनीतिक दिशा तय करेगा – जैसे भारत को वैश्विक शिक्षा‑गंतव्य के रूप में स्थापित करना, बहु‑विषयी विश्वविद्यालयों को बढ़ावा देना और भारतीय ज्ञान परंपरा, भाषाओं तथा कलाओं का मुख्यधारा उच्च शिक्षा में समावेश करना। आयोग तीनों परिषदों के काम का समन्वय करेगा, उन्हें वित्तीय सहयोग देगा और केंद्र व राज्यों दोनों को उच्च शिक्षा से जुड़े महत्त्वपूर्ण सवालों पर परामर्श देगा।​ 

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विकसित भारत शिक्षा विनियमन परिषद को उच्च शिक्षा का साझा नियामक बनाया गया है, जिसे व्यापक शक्तियाँ दी गई हैं। यह परिषद सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए मान्यता‑आधारित स्वायत्तता का मार्ग प्रशस्त करेगी, उनके वित्त, ऑडिट, अधोसंरचना, संकाय, पाठ्यक्रम और सीखने के परिणामों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक वेबसाइट और संस्थानों की स्वयं की वेबसाइट पर अनिवार्य रूप से प्रकाशित कराएगी और शिक्षा के वाणिज्यीकरण, झूठे दावों तथा वित्तीय अनियमितताओं पर सख्त कार्रवाई कर सकेगी। परिषद को चुनिंदा विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर खोलने और उत्कृष्ट भारतीय विश्वविद्यालयों को विदेश में परिसर स्थापित करने के मानक भी तय करने होंगे, बशर्ते केंद्र सरकार से पूर्व अनुमोदन हो।​ 

दूसरी ओर, विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद एक परिणाम‑आधारित मान्यता ढाँचा तैयार करेगी, जिसमें केवल भौतिक संसाधनों के बजाय सीखने के परिणाम, शैक्षणिक शासन और वित्तीय निष्पक्षता जैसे संकेतकों पर अधिक जोर होगा। यह परिषद मान्यता एजेंसियों का पैनल तैयार कर उनकी निगरानी करेगी और मान्यता‑संबंधी सभी आँकड़े सार्वजनिक कर उच्चतम स्तर की पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी। विकसित भारत शिक्षा मानक परिषद स्नातक गुणों, पाठ्यचर्या, आकलन, क्रेडिट‑ट्रांसफर और न्यूनतम शैक्षणिक मानकों के लिए राष्ट्रीय ढाँचे बनाएगी तथा भारतीय ज्ञान‑परंपरा और अंतरराष्ट्रीयकरण दोनों को संतुलित रूप से प्रोत्साहित करने के उपाय सुझाएगी।​

विधेयक के अनुसार, आयोग और परिषदों के शीर्ष पदों पर प्रख्यात शिक्षाविदों और विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाएगा। VBSA का अध्यक्ष मानद पद होगा, जिसे राष्ट्रपति की ओर से केंद्र सरकार की सिफारिश पर नियुक्त किया जाएगा और उससे उच्च प्रतिष्ठा व निष्कलंक छवि की अपेक्षा की गई है। परिषदों के अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्य ऐसे प्रोफेसर या शैक्षणिक‑प्रशासनिक नेतृत्वकर्ता होंगे, जिन्हें खोज‑cum‑चयन समिति की प्रक्रिया के बाद राष्ट्रपति नियुक्त करेंगे; इन पदों के लिए कार्यकाल और पदत्याग के बाद निजी क्षेत्र में नौकरी पर कुछ प्रतिबंध भी रखे गए हैं।​

नियमन को प्रभावी बनाने के लिए दंड प्रावधानों को कड़ा किया गया है। पहली बार उल्लंघन पर न्यूनतम 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकेगा, जबकि बार‑बार या गंभीर उल्लंघन की स्थिति में जुर्माना 30 लाख से बढ़ाकर 75 लाख रुपये तक जा सकता है और इसके साथ‑साथ जिम्मेदार अधिकारियों को हटाने, संस्थान की स्वायत्तता कम करने, डिग्री देने के अधिकार निलंबित करने, संबद्धता रद्द करने और यहाँ तक कि संस्थान बंद करने की सिफारिश करने जैसे विकल्प भी होंगे। बिना वैधानिक अनुमति के विश्वविद्यालय या उच्च शिक्षा संस्थान स्थापित करने वालों पर कम से कम 2 करोड़ रुपये के दंड और तत्काल बंद करने का प्रावधान रखा गया है।​

हालाँकि, विधेयक स्पष्ट करता है कि किसी भी दंडात्मक कार्रवाई के दौरान छात्रों के हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी और उन पर किसी प्रकार का आर्थिक भार नहीं डाला जा सकेगा। इसके लिए एक पृथक निर्णयात्मक तंत्र बनाया जाएगा और आयोग/परिषद के आदेशों के विरुद्ध केंद्र सरकार के समक्ष अपील का मार्ग खोल रखा गया है, जिसका फैसला अंतिम माना जाएगा।​

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वित्तीय रूप से, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान निधि के माध्यम से आयोग और परिषदें संचालित होंगी, जबकि केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि केंद्रीय वित्तपोषित उच्च शिक्षा संस्थानों की निधि‑संबंधी व्यवस्थाएँ इस नए नियामक से पृथक रहेंगी, ताकि नियमन, मान्यता और फंडिंग के कार्यों में स्पष्ट विभाजन बना रहे। संक्रमणकाल में UGC, AICTE और NCTE अपने-अपने अधिनियमों के तहत काम करते रहेंगे, जब तक कि नए निकायों को अधिसूचित कर पूर्ण रूप से कार्यशील नहीं कर दिया जाता; इसके बाद पुराने अधिनियमों के निरस्त होने के साथ उनकी संपत्ति, अधिकार, देनदारियाँ और नियमित कर्मचारी नए ढाँचे में समाहित कर दिए जाएँगे।

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